सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर सुप्रीम कोर्ट में गरम बहस जारी

देश के चर्चित Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश को लेकर मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। मंगलवार को Supreme Court of India में इस मुद्दे पर अहम सुनवाई हुई, जिसमें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश से जुड़े कई बड़े सवाल उठाए गए। कोर्ट 22 अप्रैल तक इन याचिकाओं का निपटारा करने की दिशा में सुनवाई कर रहा है। इस दौरान केवल सबरीमाला ही नहीं बल्कि मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना और पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार जैसे कई संवेदनशील मुद्दों पर भी चर्चा हो रही है।
केंद्र सरकार ने परंपरा बनाए रखने की दी दलील
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध बनाए रखने की अपील की। सरकार का कहना है कि भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है और उनकी पूजा पद्धति सदियों पुरानी परंपराओं पर आधारित है। यदि महिलाओं को इस आयु वर्ग में प्रवेश दिया गया तो इससे मंदिर की परंपरा और धार्मिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। केंद्र ने यह भी कहा कि संविधान में धार्मिक विविधता की रक्षा का प्रावधान है और इस संतुलन को बनाए रखना जरूरी है।

अनुच्छेद 25 और 26 पर गहन बहस
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का हवाला देते हुए कहा कि भारत में धर्म की अवधारणा बेहद व्यापक और विविध है। उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म में कई उप-संप्रदाय हैं जिनकी अपनी पहचान और परंपराएं हैं। इसी तरह इस्लाम में भी आंतरिक विविधता मौजूद है। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि धार्मिक मामलों की व्याख्या करते समय इन विविधताओं को ध्यान में रखा जाए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी एक दृष्टिकोण से पूरे धर्म को नहीं समझा जा सकता और यही भारत की धार्मिक संरचना की विशेषता है।
धार्मिक विविधता और संवैधानिक संतुलन पर जोर
तुषार मेहता ने आगे कहा कि भारतीय संविधान ने कुछ स्वतंत्रताएं अमेरिकी संविधान से ली हैं, लेकिन अनुच्छेद 25 और 26 विशेष रूप से भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि Nizamuddin Dargah और शिरडी जैसे स्थलों पर सभी धर्मों के लोग जाते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक सीमाएं कई बार लचीली होती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू धर्म में नास्तिक और अलग-अलग विचारधारा वाले लोग भी शामिल हो सकते हैं। इस सुनवाई के दौरान कोर्ट को यह तय करना है कि धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाला फैसला देशभर में धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण पर बड़ा असर डाल सकता है।